रविवार, 17 मार्च 2019

राजलोग_वशीकरण_व_चिरस्थाई_लक्ष्मी_प्राप्ति_साधना

श्रीआदि शङ्कराचार्य-विरचित कल्याण-वृष्टि-स्तोत्र या षोडशी-कल्याण-स्तोत्र ( षोडशी श्रीविद्या के मूल-मन्त्र के प्रत्येक अक्षर पर आधृत इसमें सोलह श्लोक है )का प्रतिदिन रात्रि-काल, पश्चिम-दिशा कि ओर मुख कर, लाल आसन ( ऊन या कम्बल) पर बैठकर, श्रीमहालक्ष्मी का व अन्य देवी-देवताओं का प्रारम्भिक पूजन कर, ह्रीं ह्रीं ह्रीं से सम्पुटित इस पावन " कल्याण-वृष्टि ' स्तोत्र का नियमानुसार 30 पाठ एक वर्ष करने से राजलोगों का वशीकरण होता है साथ ही चञ्चला लक्ष्मी चिरकाल के लिये स्थाई हो जाती है व साधक का परम कल्याण निश्चित है। ऐसा फलश्रुति से स्पष्ट है।
यह स्तोत्र " गीताप्रेस,गोरखपुर " से प्रकाशित पुस्तक " देवी-स्तोत्र- रत्नाकर " की पृष्ठ-संख्या 131 से 136 पर शुद्ध-रूप से दिया गया है। यह पुस्तक प्रत्येक देवी-उपासना के पास अवश्य होना चाहिए।
साधक उपरोक्त साधना करने से पहले किसी योग्य विद्वान से परामर्श अवश्य प्राप्त करले।
साधनागत किसी भी प्रकार के लाभ-हानि के लिए हम उत्तरदायी नहीं है। क्योंकि पाठकगण की योग्यता व आपके द्वारा चयनित विद्वान का कोई माप-दण्ड हमारे पास नहीं है।
योग्य विद्वान व सद् गुरु भी भगवती की कृपा से प्राप्त होते हैं।
पाठकों के लाभार्थ स्तोत्र निम्नलिखित हैं -
कल्याणवृष्टिभिरिवामृतपूरिताभि-
र्लक्ष्मीस्वयंवरणमङ्गलदीपिकाभिः ।
सेवाभिरम्ब तव पादसरोजमूले
नाकारि किं मनसि भाग्यवतां जनानाम् ॥ १॥
एतावदेव जननि स्पृहणीयमास्ते
त्वद्वन्दनेषु सलिलस्थगिते च नेत्रे ।
सान्निध्यमुद्यदरुणायुतसोदरस्य
त्वद्विग्रहस्य परया सुधयाप्लुतस्य ॥ २॥
ईशात्वनामकलुषाः कति वा न सन्ति
ब्रह्मादयः प्रतिभवं प्रलयाभिभूताः ।
एकः स एव जननि स्थिरसिद्धिरास्ते
यः पादयोस्तव सकृत्प्रणतिं करोति ॥ ३॥
लब्ध्वा सकृत्त्रिपुरसुन्दरि तावकीनं
कारुण्यकन्दलितकान्तिभरं कटाक्षम् ।
कन्दर्पकोटिसुभगास्त्वयि भक्तिभाजः
संमोहयन्ति तरुणीर्भुवनत्रयेऽपि ॥ ४॥
ह्रींकारमेव तव नाम गृणन्ति वेदा
मातस्त्रिकोणनिलये त्रिपुरे त्रिनेत्रे ।
त्वत्संस्मृतौ यमभटाभिभवं विहाय
दीव्यन्ति नन्दनवने सह लोकपालैः ॥ ५॥
हन्तुः पुरामधिगलं परिपीयमानः
क्रूरः कथं न भविता गरलस्यवेगः ।
नाश्वासनाय यदि मातरिदं तवार्धं
देवस्य शश्वदमृताप्लुतशीतलस्य ॥ ६॥
सर्वज्ञतां सदसि वाक्पटुतां प्रसूते
देवि त्वदङ्घ्रिसरसीरुहयोः प्रणामः ।
किं च स्फुरन्मुकुटमुज्ज्वलमातपत्रं
द्वे चामरे च महतीं वसुधां ददाति ॥ ७॥
कल्पद्रुमैरभिमतप्रतिपादनेषु
कारुण्यवारिधिभिरम्ब भवत्कटाक्षैः ।
आलोकय त्रिपुरसुन्दरि मामनाथं
त्वय्येव भक्तिभरितं त्वयि बद्धतृष्णम् ॥ ८॥
हन्तेतरेष्वपि मनांसि निधाय चान्ये
भक्तिं वहन्ति किल पामरदैवतेषु ।
त्वामेव देवि मनसा समनुस्मरामि
त्वामेव नौमि शरणं जननि त्वमेव ॥ ९॥
लक्ष्येषु सत्स्वपि कटाक्षनिरीक्षणाना-
मालोकय त्रिपुरसुन्दरि मां कदाचित् ।
नूनं मया तु सदृशः करुणैकपात्रं
जातो जनिष्यति जनो न च जायते वा ॥ १०॥
ह्रींह्रीमिति प्रतिदिनं जपतां तवाख्यां
किं नाम दुर्लभमिहत्रिपुराधिवासे ।
मालाकिरीटमदवारणमाननीया
तान्सेवते वसुमती स्वयमेव लक्ष्मीः ॥ ११॥
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदाननिरतानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यम् ॥ १२॥
कल्पोपसंहृतिषु कल्पितताण्डवस्य
देवस्य खण्डपरशोः परभैरवस्य ।
पाशाङ्कुशैक्षवशरासनपुष्पबाणा
सा साक्षिणी विजयते तव मूर्तिरेका ॥ १३॥
लग्नं सदा भवतु मातरिदं तवार्धं
तेजः परं बहुलकुङ्कुम पङ्कशोणम् ।
भास्वत्किरीटममृतांशुकलावतंसं
मध्ये त्रिकोणनिलयं परमामृतार्द्रम् ॥ १४॥
ह्रींकारमेव तव नाम तदेव रूपं
त्वन्नाम दुर्लभमिह त्रिपुरे गृणन्ति ।
त्वत्तेजसा परिणतं वियदादिभूतं
सौख्यं तनोति सरसीरुहसम्भवादेः ॥ १५॥
ह्रींकारत्रयसम्पुटेन महता मन्त्रेण सन्दीपितं
स्तोत्रं यः प्रतिवासरं तव पुरो मातर्जपेन्मन्त्रवित् ।
तस्य क्षोणिभुजो भवन्ति वशगा लक्ष्मीश्चिरस्थायिनी
वाणी निर्मलसूक्तिभारभरिता जागर्ति दीर्घं वयः ॥ १६॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य
श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य
श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ
कल्याणवृष्टिस्तवः सम्पूर्णः ॥

शनिवार, 16 मार्च 2019

श्री कार्तवीर्यार्जुन मन्त्र-प्रयोग

श्री कार्तवीर्यार्जुन मन्त्र-प्रयोग
आज के धन-प्रधान युग में यदि किसी का परिश्रम से कमाया हुआ धन किसी जगह फँस जाए तथा उसकी पुनः प्राप्ति की सम्भावना भी दिखाई न पड़े, तो श्रीकार्तवीर्यार्जुन का प्रयोग अचूक तथा सद्यः फल-दायी होता है ।
श्रीकार्तवीर्यार्जुन का प्रयोग ‘तन्त्र’-शास्त्र की दृष्टि से बड़े गुप्त बताए जाते हैं । इस प्रयोग से साधक गत-नष्ट धन को तो प्राप्त कर ही सकता है, साथ ही षट्-कर्म-साधन यहाँ तक कि प्रत्येक अभिलषित-प्राप्ति में भी सफल हो सकता है ।
पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार भगवान् विष्णु के अमित तेजस्वी ‘सुदर्शन चक्र’ के अवतार – हैहय-वंशी राजा कार्तवीर्यार्जुन को हजार भुजाएँ होने के कारण ‘सहस्रार्जुन’ भी कहा जाता था ।
प्रयोग हेतु आवश्यक निर्देश
१॰ प्रयोग की सफलता एवं निर्विघ्नता हेतु सर्व-प्रथम भू-शुद्धि, आसन-शुद्धि, भूत-शुद्धि, भूतोपसंहार, स्व-प्राण-प्रतिष्ठा आदि आवश्यक कर्म कर ‘श्रीविघ्न-विनाशक’ गणेश का पूजन एवं ‘कलश-स्थापन’ करें । स्वयं न कर सकें, तो विद्वान ब्राह्मण का सहयोग प्राप्त करें ।
२॰ फिर वैष्णव अष्ट-गन्ध (चन्दन, अगर, कर्पूर, चोर, कुंकुम, रोचना, जटामांसी तथा मुर) से कार्तवीर्य-यन्त्र की रचना करें ।
३॰ यन्त्र में प्राण-प्रतिष्ठा कर आवरण पूजा करें ।
४॰ कामना-भेद के अनुसार निश्चित संख्या में जप करें । जप पूरा होने पर दशांश ‘हवन‘, तद्दशांश ‘तर्पण, मार्जन व ब्राह्मण-भोज करावें ।
५॰ प्रयोग की सफलता के लिए दस सहस्र ‘गायत्री-जप’ परमावश्यक है ।
६॰ जप की पूर्ण-संख्या को इस प्रकार बाँटें कि वह सम-संख्या के आधार पर प्रतिदिन किया जा सके । किसी दिन कम और किसी दिन अधिक ‘जप’ नहीं किया जाना चाहिए ।
७॰ प्रतिदिन जितनी देर जप चले, उतने समय तक अखण्ड-दीपक अवश्य ही प्रज्जवलित रहना आवश्यक है ।
८॰ जब तक प्रयोग चले, तब तक शास्त्रोक्त नियमों का पालन करें ।
९॰ प्रयोग करने से पूर्व मन्त्र को पुरश्चरण द्वारा सिद्ध कर लेना चाहिए ।
साधना-क्रम
१॰ शुद्ध होकर, संकल्प करें – देश-कालौ सङ्कीर्त्य अमुक-कामना सिद्धयर्थं मम श्रीकार्तवीर्यार्जुन-देवता-प्रीति-पुरस्सरं क्षिप्रममुक-जनस्य बुद्धि-हरण-पूर्वकं स्व-धन-प्राप्तये मनोऽभिलषित-कार्य-सिद्धये वा दीप-दान-पूर्वकं अमुकामुक-संख्यात्मकं जप-रुप-प्रयोगमहं करिष्यामि । – इस प्रकार सङ्कल्प करने के बाद श्रीगणेशादि-पूजन करें ।
२॰ गोबर से लेपन कर शुद्ध स्थान (पक्का फर्श हो, तो धोकर पञ्च-गव्य से प्रोक्षण करें) पर ताँबे का बर्तन रखें तथा उसमें लाल चन्दन अथवा रोली से षट्-कोण बनाकर, उसके बीच में “ॐ फ्रों” लिखें । फिर उसमें एक ताँबे का दीप-पात्र (सरसों के तेल, मौली या लाल रंग से रँगी रुई की बत्ती सहित) निम्न मन्त्र पढ़ते हुए स्थापित करें –
शुद्ध तैल-दीपमयं, स्थापयामि जगत्पते !
कार्तवीर्य, महा-वीर्य ! कार्यं सिद्धयतु मे हि तत् ।।
३॰ दीप-पात्र के दाहिने भाग में (अर्थात् साधक के बाँई ओर) एक नई छुरी – निम्न मन्त्र पढ़कर स्थापित करें । छुरी की धार ‘दक्षिण’- दिशा की ओर रहे और उसकी नोक (अग्र-भाग) साधक की ओर रहे – “ॐ नमः सुदर्शनास्त्राय फट् ।”
४॰ ‘दीपक’ का मुख पश्चिम की ओर या साधक की ओर रखें । निम्न मन्त्र से उसे प्रज्जवलित करें –
“ॐ कार्तवीर्य नृपाधीश ! योग-ज्वलित-विग्रह !
भव सन्निहितो देव ! ज्वाला-रुपेण दीपके ।।”
५॰ मन्त्रोच्चार-पूर्वक ‘दीपक’ की ज्योति में प्राण-प्रतिष्ठा करें । यथा – पहले प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र का विनियोग पढ़ें –
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीप्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्रस्य अजेश-पद्मजाः ऋषयः, ऋग्-यजुः-सामानि छन्दांसि, प्राण-शक्तिर्देवता, आं बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्रों कीलकं, श्रीकार्तवीर्यार्जुन-देव-दीपे प्राण-प्रतिष्ठापने विनियोगः ।
‘श्रीकार्तवीर्यार्जुन-दीप-देवतायै नमः’ से लाल चन्दन एवं पुष्पादि से दीपक की पूजा करें । पूजा करने के बाद निम्न मन्त्र पढ़कर ‘दीप-समर्पण’ करें –
कार्तवीर्य महावीर्य ! भक्तानामभयं-कर !
दीपं गृहाण मद्-दत्तं, कल्याणं कुरु सर्वदा ।।
अनेन दीप-दानेन, ममाभीष्टं प्रयच्छ च ।
फिर ‘दीपक’ की सन्निधि में निम्न-लिखित मन्त्र ‘प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र’ का जप करें –
मन्त्रः- “ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हं ॐ क्षं सं हंसः ह्रीं ॐ हंसः ।”
फिर श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र का विनियोगादि कर जप करें –
श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र का विनियोगः- ॐ अस्य श्रीकार्तवीर्यार्जुन (स्तोत्रस्य) मन्त्रस्य दत्तात्रेय ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीकार्तवीर्यार्जुनो देवता, फ्रों बीजं, ह्रीं शक्तिः, क्लीं कीलकं ममाभीष्ट-सिद्धये जपे विनियोगः ।
ऋष्यादि-न्यासः- दत्तात्रेय ऋषये नमः शिरसि, अनुष्टुप छन्दसे नमः मुखे, श्रीकार्तवीर्यार्जुनो देवतायै नमः हृदि, फ्रों बीजाय नमः गुह्ये, ह्रीं शक्तये नमः पादयो, क्लीं कीलकाय नमः नाभौ ममाभीष्ट-सिद्धये जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
कर-न्यासः- ॐ आं फ्रों ब्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः, ॐ ईं क्लीं भ्रूं तर्जनीभ्यां नमः, ॐ हुं आं ह्रीं मध्यमाभ्यां नमः, ॐ क्रैं क्रौं श्रीं अनामिकाभ्यां नमः, ॐ हुं फट् कनिष्ठिकाभ्यां नमः, ॐ कार्तवीर्यार्जुनाय कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादि-न्यासः- ॐ आं फ्रों ब्रीं हृदयाय नमः, ॐ ईं क्लीं भ्रूं शिरसे स्वाहा, ॐ हुं आं ह्रीं शिखायै वषट्, ॐ क्रैं क्रौं श्रीं कवचाय हुम्, ॐ हुं फट् अस्त्राय फट्, ॐ कार्तवीर्यार्जुनाय नमः सर्वाङ्गे ।
टिप्पणी – नेत्रों का ‘न्यास’ नहीं होगा अर्थात् षडङ्ग के स्थान पर ‘पञ्चाङ्ग-न्यास’ का ही विधान है ।
मन्त्र-न्यासः- ॐ फ्रों ॐ हृदये । ॐ ब्रीं ॐ जठरे । ॐ क्लीं ॐ नाभौ । ॐ भ्रूं ॐ जठरे । ॐ आं ॐ गुह्ये । ॐ ह्रीं ॐ दक्ष-चरणे । ॐ क्रों ॐ वाम-चरणे । ॐ श्रीं ॐ ऊर्वोः । ॐ हुं ॐ जानुनो । ॐ फट् ॐ जङ्घयोः । ॐ कां मस्तके । ॐ तं ललाटे । ॐ वीं भ्रुवोः । ॐ यां कर्णयो । ॐ जुं नेत्रयोः । ॐ नां नासिकायां । ॐ यं मुखे । ॐ नं गले । ॐ मः स्कन्धयोः ।
व्यापक-न्यासः- मूल-मन्त्र से सर्वाङ्ग-न्यास करें ।
ध्यानः-
उद्यत्-सूर्य-सहस्र्कान्तिरखिल-क्षोणी-धवैर्वन्दितः ।
हस्तानां शत-पञ्चकेन च दधच्चापानिषूंस्तावता ।।
कण्ठे हाटक-मालया परिवृतश्चक्रावतारो हरेः ।
पायात् स्यन्दनगोऽरुणाभ-वसनाः श्रीकार्तवीर्यो नृपः ।।
मूल-मन्त्रः-
“ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः ।”
जप-संख्या एवं हवनादि – एक लाख । तद्दशांश हवन, तर्पण, मार्जन या अभिषेक, ब्राह्मण-भोजन ।
हवन-सामग्री- चावल, खीर तथा तिल-मिश्रित घृत ।
कामना-भेद से हवन-सामग्री – सरसों-रीठा-लहसुन-कपास –मारण । धतूरा या गोरोचन-गोबर –स्तम्भन । नीम-पत्र –विद्वेषण । कमल या कमल-बीज –आकर्षण । हल्दी या चम्पा-चमेली –वशीकरण । बहेड़ा व खैर-समिधा –उच्चाटन । कस्तूरी-गोरोचन –घर से भागे व्यक्ति की वापसी । कमल-मक्खन-कस्तूरी –गत धन की प्राप्ति । यव (जौ) –लक्ष्मी-प्राप्ति । तिल-घी –पाप-नाश । तिल-चावल-साँवक-लाजा –राज-वशीकरण । अपामार्ग-आक-दूर्वा –पाप-नाश व लक्ष्मी-प्राप्ति । गुग्गुल –प्रेत-शान्ति । पीपल-गूलर-पाकड़-बड़-बेल-समिधा –क्रमशः सन्तान, आयु, धन, सुख, शान्ति । साँप की केँचुली-धतूरा-पीली सरसों-नमक –चोर-नाश । धान –भूमि-प्राप्ति ।
टिप्पणी – सामान्य रुप से किसी भी काम्य कर्म की सफलता के लिए, जितनी संख्या ‘जप’ की होगी, उसका दशांश ‘हवन’ होगा, परन्तु जब कार्य-समस्या जटिल हो या सद्यः फल-प्राप्ति की इच्छा हो, तो हवन-संख्या एक सहस्र से दस सहस्र तक ।
कामना-भेद से जप-संख्याः- बन्दी-मोक्ष- १२०००, वाद-विवाद (मुकदमे में) जय- १५०००, दबे या नष्ट-धन की पुनः प्राप्ति- १३०००, वाणी-स्तम्भन-मुख-मुद्रण- १००००, राज-वशीकरण- १००००, शत्रु-पराजय- १००००, नपुंसकता-नाश/पुनः पुरुषत्व-प्राप्ति- १७०००, भूत-प्रेत-बाधा-नाश- ३७०००, सर्व-सिद्धि- ५१०००, सम्पूर्ण साफल्य हेतु- १२५००० ।
प्रत्येक प्रयोग में “दीप-दान” परमावश्यक है ।
हवन के पश्चात् ‘तर्पण’ करना होता है । वैसे तो तर्पण हवन का दशांश होता है, किन्तु कार्य की आवश्यकतानुसार हवन के अनुसार ही तर्पण भी एक हजार से दस हजार तक किया जा सकता है । कामना-भेद से तर्पणीय जल में हवन-सम्बन्धी सामग्री को आंशिक रुप में मिश्रित कर सकते हैं ।
तर्पण-विधिः- ताम्र-पात्र में कार्तवीर्यार्जुन-यन्त्र या ‘फ्रों’ बीज लिखें । उसी पात्र में निम्न मन्त्र से तर्पण करें – “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः कार्तवीर्यार्जुनं तर्पयामि नमः ।”
अभिषेक-विधिः- ‘अभिषेक’ के सम्बन्ध में दो मत हैं – (१) देवता का मार्जन तथा (२) यजमान का मार्जन । दोनों के मन्त्र निम्न प्रकार हैं – (१) “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः कार्तवीर्यार्जुनं अभिषिञ्चामि ।” (२) “ॐ फ्रों ब्रीं क्लीं भ्रुं आं ह्रीं क्रों श्रीं हुं फट् कार्तवीर्यार्जुनाय नमः आत्मानं अमुकं वा अभिषिञ्चामि ।”
‘कार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र-प्रयोग’ में यजमान के मार्जन/अभिषेक की एक विशिष्ट विधि निम्न प्रकार है – शुद्ध भूमि पर गोबर/पञ्च-गव्य का लेपन/प्रोक्षण करें । उस पर अष्ट-गन्ध या लाल चन्दन से कार्तवीर्यार्जुन-यन्त्र बनावें । उस यन्त्र पर विधि-पूर्वक कलश स्थापित करें । कलश में कार्तवीर्यार्जुन का आवाहन कर यथा-विधि पूजन करें । पूर्वोक्त विधि के अनुसार दीपक जलावें । बाँएँ हाथ से कुम्भ को स्पर्श करते हुए मूल-मन्त्र की दस माला जप करें । इस अभिमन्त्रित जल से स्वयं तथा स्व-जनों का अभिषेक करें ।
ऐसा करने से पुत्र, यश, आयु, स्व-जन-प्रेम, वाक-सिद्धि, गृहस्थ-सुख की प्राप्ति होती है तथा जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है । मारण/कृत्यादि अभिचार-कर्म से प्रभावित तथा पीड़ित व्यक्ति को उस प्रभाव से मुक्ति मिलती है ।
श्रीकार्तवीर्यार्जुन-मन्त्र के जपानुष्ठान में आसन आदि लाल रंग के होते हैं । शङ्ख की माला सर्वोत्तम, रक्त-चन्दन की मध्यम तथा अन्य मालाएँ भी ठीक मानी गई है । अनुष्ठान की सफलता हेतु मूल-मन्त्र के आवश्यक जप के साथ दस गायत्री जप आवश्यक बतलाया गया है । कुछ विद्वानों का मत है कि जिस देवता के मन्त्र का जप किया जाए, उसी देवता की ‘गायत्री’ का ही जप होना चाहिए । अस्तु “श्रीकार्तवीर्यार्जुन-गायत्री” इस प्रकार है –
“ॐ कार्तवीर्याय विद्महे महा-वीर्याय धीमहि तन्नोऽर्जुनः प्रचोदयात् ।”

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम्

बसंत पञ्चमी ( 9 फरवरी 2019 शनिवार )

श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्रम्

श्री सिद्ध सरस्वती स्तोत्र विद्यार्थी वर्ग सहित प्रत्येक वर्ग के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है।

इसके विधिवत अनुष्ठान-पाठ से भगवती शारदा की महती कृपा प्राप्ति के साथ-साथ व्यक्ति वाग्वैभव सपन्न, वाक्पटु हो जाता है, उसके समस्त बुद्धिगत विकार नष्ट होकर शुद्ध-बुद्धि की प्राप्ति होती है।

विद्यार्थी वर्ग के अध्ययन में आने वाले समस्त अवरोध समाप्त हो जाते है। भगवती सरस्वती उसका पुत्रवत पालन व रक्षा करती है। यह सब इस स्तोत्र कि फलश्रुति से स्पष्ट हो जाता है।

पूज्य श्रीस्वामीजी महाराज इस स्तोत्र की बड़ी प्रशंसा करते थे व उनके आदेशानुसार पाठकर अनेकों भक्त लाभान्वित हुए।

पाठ विधि

प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व स्नानादि पूर्ण कर, प्रारंभिक पूजा-अर्चना, संकल्पादि करने के पश्चात् हाथ में जल लेकर विनियोग करें -

ॐ अस्य श्रीसरस्वतीस्तोत्रमन्त्रस्य । ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । श्रीसरस्वती देवता । धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।

जल को भगवती के वाम भाग की ओर भूमि पर गिरा दे।

पश्चात् भगवती का पञ्चोपचार से पूजन कर इस दिव्य स्तोत्र का ( वसंत पञ्चमी ९ फरवरी २०१९ शनिवार ) से प्रतिदिन विषम संख्या में ( १-३-५-७ आदि क्रम का निर्धारण कर ) पाठ करे व मास की दोनों त्रयोदशी को ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए, सात्विक भोजन एक ही बार ग्रहण करें। तथा २१ पाठ करे। यह क्रम अगली वसंत पञ्चमी तक रहेगा। एक वर्ष में आप स्वयं परिवर्तन अनुभव करें।

प्रस्तुत है सिद्ध सरस्वती स्तोत्र

आरूढा श्वेतहंसे भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं
वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्या ।
सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपैः शास्त्रविज्ञानशब्दैः
क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ॥ १॥

श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।
अर्चिता मुनिभिः सर्वैः ऋर्षिभिः स्तूयते सदा ।
एवं ध्यात्वा सदा देवीं वाञ्छितं लभते नरः ॥ २॥

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं
वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् ।
हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां
वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥ ३॥

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ ४॥

ह्रीं ह्रीं हृद्यैकबीजे शशिरुचिकमले कल्पविस्पष्टशोभे
भव्ये भव्यानुकूले कुमतिवनदवे विश्ववन्द्यांघ्रिपद्मे ।
पद्मे पद्मोपविष्टे प्रणतजनमनोमोदसम्पादयित्रि
प्रोत्फुल्लज्ञानकूटे हरिनिजदयिते देवि संसारसारे ॥ ५॥

ऐं ऐं ऐं दृष्टमन्त्रे कमलभवमुखाम्भोजभूतस्वरूपे
रूपारूपप्रकाशे सकलगुणमये निर्गुणे निर्विकारे ।
न स्थूले नैव सूक्ष्मेऽप्यविदितविभवे नापि विज्ञानतत्वे
विश्वे विश्वान्तरात्मे सुरवरनमिते निष्कले नित्यशुद्धे ॥ ६॥

ह्रीं ह्रीं ह्रीं जाप्यतुष्टे हिमरुचिमुकुटे वल्लकीव्यग्रहस्ते
मातर्मातर्नमस्ते दह दह जडतां देहि बुद्धिं प्रशस्ताम् ।
विद्ये वेदान्तवेद्ये परिणतपठिते मोक्षदे मुक्तिमार्गे ।
मार्गातीतस्वरूपे भव मम वरदा शारदे शुभ्रहारे ॥ ७॥

धीं धीं धीं धारणाख्ये धृतिमतिनतिभिर्नामभिः कीर्तनीये
नित्येऽनित्ये निमित्ते मुनिगणनमिते नूतने वै पुराणे ।
पुण्ये पुण्यप्रवाहे हरिहरनमिते नित्यशुद्धे सुवर्णे
मातर्मात्रार्धतत्वे मतिमति मतिदे माधवप्रीतिमोदे ॥ ८॥

ह्रूं ह्रूं ह्रूं स्वस्वरूपे दह दह दुरितं पुस्तकव्यग्रहस्ते
सन्तुष्टाकारचित्ते स्मितमुखि सुभगे जृम्भिणि स्तम्भविद्ये ।
मोहे मुग्धप्रवाहे कुरु मम विमतिध्वान्तविध्वंसमीडे
गीर्गौर्वाग्भारति त्वं कविवररसनासिद्धिदे सिद्धिसाध्ये ॥ ९॥

स्तौमि त्वां त्वां च वन्दे मम खलु रसनां नो कदाचित्त्यजेथा
मा मे बुद्धिर्विरुद्धा भवतु न च मनो देवि मे यातु पापम् ।
मा मे दुःखं कदाचित्क्वचिदपि विषयेऽप्यस्तु मे नाकुलत्वं
शास्त्रे वादे कवित्वे प्रसरतु मम धीर्मास्तु कुण्ठा कदापि ॥ १०॥

इत्येतैः श्लोकमुख्यैः प्रतिदिनमुषसि स्तौति यो भक्तिनम्रो
वाणी वाचस्पतेरप्यविदितविभवो वाक्पटुर्मृष्टकण्ठः ।
सः स्यादिष्टाद्यर्थलाभैः सुतमिव सततं पातितं सा च देवी
सौभाग्यं तस्य लोके प्रभवति कविता विघ्नमस्तं व्रयाति ॥ ११॥

र्निविघ्नं तस्य विद्या प्रभवति सततं चाश्रुतग्रन्थबोधः
कीर्तिस्रैलोक्यमध्ये निवसति वदने शारदा तस्य साक्षात् ।
दीर्घायुर्लोकपूज्यः सकलगुणनिधिः सन्ततं राजमान्यो
वाग्देव्याः सम्प्रसादात्त्रिजगति विजयी जायते सत्सभासु ॥ १२॥

ब्रह्मचारी व्रती मौनी त्रयोदश्यां निरामिषः ।
सारस्वतो जनः पाठात्सकृदिष्टार्थलाभवान् ॥ १३॥

पक्षद्वये त्रयोदश्यामेकविंशतिसंख्यया ।
अविच्छिन्नः पठेद्धीमान्ध्यात्वा देवीं सरस्वतीम् ॥ १४॥

सर्वपापविनिर्मुक्तः सुभगो लोकविश्रुतः ।
वाञ्छितं फलमाप्नोति लोकेऽस्मिन्नात्र संशयः ॥ १५॥

ब्रह्मणेति स्वयं प्रोक्तं सरस्वत्याः स्तवं शुभम् ।
प्रयत्नेन पठेन्नित्यं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १६॥

॥ इति श्रीमद्ब्रह्मणा विरचितं सरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

पाठ करने के पश्चात् हाथ में जल लेकर भगवती के वामांग में निवेदित कर दे। क्षमा प्रार्थना कर प्रसन्न मन से अपने कर्तव्य कर्म को पूरा करें।