शनिवार, 2 जनवरी 2010

मंत्र साधना की साधारण विधि -1

प्रिय आत्म स्वरुप ,
मंत्र ही दुखो से छुटकारा दिलाकर सर्व सुखो की प्राप्ति करा देता है/ मंत्र ही स्वस्वरुप की स्थिति का बोध कराता है / मंत्र ही मुक्ति और भुक्ति का कारक बन जाता है /मंत्र ही इस संसार की नश्वरता को दर्शाता है / मंत्र साधना से ही मन के उद्वेग शांत हो जाते है और साधक परम शांति को अनुभव करता है और ब्राह्मी भाव को प्राप्त हो जाता है /
मंत्र के इन सब गुणों के कारण ही बौध , जैन, मुस्लिम, सिख आदि सभी धर्म मंत्र के महत्त्व को एकमत से स्वीकार करते है और इन सभी धर्मो में भी मंत्र साधनाये की जाती है /
हमारे हिन्दू धर्म में तीन प्रकार के मंत्र मुख्तया प्रचलन में है/ वैदिक, शाबर और तांत्रिक
मै अभी केवल उन वैदिक मंत्रो के बारे में जानकारी दूंगा जिनकी साधना सरलता से की जा सके और जिनसे किसी भी प्रकार से हानि की सम्भावना न हो /
मंत्र देवता की प्रसन्नता के लिए किया सबसे सरलतम उपाय या तरीका है
सर्व प्रथम मंत्र शुद्ध हो और हम इसका शुद्ध उच्चारण कर सके , इसलिए इसे गुरु मुख से ग्रहण करना चाहिए / मंत्र दीक्षा के लिए ग्रहण-काल ही सर्वोत्तम समय माना गया है किसी भी शांत तीर्थ/शक्ति पीठ स्थल में मंत्र ग्रहण करना चाहिए /
मंत्र के पांच अंग - ऋषि ,शक्ति ,बीज ,कीलक, और विनियोग की जानकारी होनी चाहिए /
शापित और कीलित मंत्र का शापोद्धार और उत्कीलन सर्वप्रथम ही किया जाता है /
शुद्ध आसन पर बैठ कर स्व पवित्र होकर आसन भी पवित्र करे / शुद्ध घी का दीपक जलाये , जल का कलश रखे /
सभी भूत बढाओ का निराकरण सभी दिशाओ में अभिमंत्रित सरसों फेकते हुए करे /
इसके बाद दिग्बन्धन करे
फिर विनियोग ,रिश्यदिन्यास, करण्यास, अगन्यास करे
अब देवता या देवी जो भी हो उनका ध्यान करे
तदुपरांत प्राणायाम करते हुए मंत्र जप प्रारंभ करे / मंत्र का जप निर्धारित संख्या में निर्धारित माला से ही करना चाहिए /
मंत्र साधना इतने मनोयोग से की जनि चाहिए की आपको अपने द्वारा की गई साधना पर्व गर्व हो की 'मैंने सम्पूर्ण मनोयोग से कार्य किया और किसी भी प्रकार की त्रुटी नहीं की " तब आपका ये मनोयोग पूर्ण साधना फलदायक हो जाएगी /
शेष अगले भाग में ........
शुभमस्तु /

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