शनिवार, 17 अगस्त 2013

वीर सावरकर

वीर सावरकर को काला पानी की सजा के दौरान भयानक सैल्यूलर जेल मैं रखा गया। उन्हें दूसरी मंजिल की कोठी नंबर २३४ मैं रखा गया और उनके कपड़ो पर भयानक कैदी लिखा गया। कोठरी मैं सोने और खड़े होने पर दीवार छू जाती थी। उन्हें नारियल की रस्सी बनाने और ३० पौंड तेल प्रतिदिन निकलने के लिए बैल की तरह कोल्हू मैं जोता जाता था। इतना कष्ट सहने के बावजूद भी वह रात को दीवार पर कविता लिखते, उसे याद करते और मिटा देते। १३ ...मार्च १९१० से लेकर १० मई १९३७ तक २७ वर्षो की अमानवीय पीडा भोग कर उच्च मनोबल, ज्ञान और शक्ति साथ वह जेल से बाहर निकले जैसे अँधेरा चीर कर सूर्य निकलता है।

आजादी के बाद भी पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस ने उनसे न्याय नहीं किया। देश का हिन्दू कहीं उन्हें अपना नेता न मान बैठे इसलिए उन पर महात्मा गाँधी की हत्या का आरोप लगा कर लाल किले मैं बंद कर दिया गया। बाद मे. न्यायालय ने उन्हें ससम्मान रिहा कर दिया। पूर्वाग्रह से ग्रसित कांग्रेसी नेताओं ने उन्हें इतिहास मैं यथोचित स्थान नहीं दिया। स्वाधीनता संग्राम में केवल गाँधी और गांधीवादी नेताओं की भूमिका का बढा-चढ़ाकर उल्लेख किया गया।

वीर सावरकर की मृत्यु के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें नहीं छोडा। सन २००३ मैं वीर सावरकर का चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष मैं लगाने पर कांग्रेस ने विवाद खडा कर दिया था। २००७ मैं कांग्रेसी नेता मणि शंकर अय्यर ने अंडमान के कीर्ति स्तम्भ से वीर सावरकर के नाम का शिलालेख हटाकर महात्मा गाँधी के नाम का पत्थर लगा दिया। जिन कांग्रेसी नेताओ ने राष्ट्र को झूठे आश्वासन दिए, देश का विभाजन स्वीकार किया, जिन्होंने शेख से मिलकर कश्मीर का सौदा किया, वो भले ही आज पूजे जाये पर क्या वीर सावरकर को याद रखना इस राष्ट्र का कर्तव्य नहीं है?

रविवार, 11 अगस्त 2013

अभिचार-कर्म नाशक :साबर साधना



आजकल छोटी-मोटी तंत्र का क्रिया लोग शत्रुत्व के हिसाब से कराते रहेते है,थोडासा भी क्या मनमुटाव हो गया तो समजो एक तो खुद करेगे या किसी तांत्रिक को पैसा देकर दूसरों को परेशान करने का काम करेगे,ये साधना करने के बाद न अब तांत्रिक सो पाएगा ना ही प्रयोग करने वाला छोटा डॉन चैन से सो पायेगा हा हा हा.................अब तो मजा आजायेगा..........क्यूकी इस प्रयोग से तंत्र बाधा जहा समाप्त होती है वही आप पर किए जाने वाले तंत्र-मंत्र इत्यादि वापस लौट जाते है,आप पर प्रयोग करने वाले की पुंगी बज जाती है..............हर लड़की ने तो यह प्रयोग करना ही चाहिए ताकि उन्हे पता चले उनपर किसिने वशीकरण तो नहीं किया है???समस्याये अनेक परंतु उपाय एक साबर मंत्र साधना.......

साधना तो बेहद आसान है,साधना काल मे ब्रम्हचैर्यत्व आवश्यक है,माला रुद्राक्ष का हो,धोती और आसन भगवे एवं लाल रंग का हो,दीपक मे सिर्फ देशी घी होना चाहिये,लोबान का धूप जलाओ,साधना से पूर्व गणेश जी ,गुरुजी और दत्त-महाप्रभुजी का पूजन आवश्यक है॰

निम्न मंत्र का जाप किसि भी शनिवार से करे,यह साधना 11 दिन का है,साधना शाम के समय करना अनुकूल है,साधना मे नित्य 108 बार मंत्र जाप आवश्यक है,मंत्र का जब भी स्वयं के लिए प्रयोग करना हो तो 7 बार मंत्र बोलकर जल पे 3 बार फुक मारे और जल को ग्रहण करले दूसरे व्यक्ति के लिये भि यही विधान है,अगर प्रयोग आपके सामने किया जा रहा हो तो तुरंत ही ७ बार मंत्र बोलकर अपने सिने पे ३ फुक मारले........तो तंत्र-मंत्र का असर नष्ट होता है और किया गया तंत्र-मंत्र करनेवाले पे वापस लौट जाता है......

मंत्र-

जल बाँधो,जलाजल बाँधो । जल के बाँधो कीरा,नौ नगर के राजा बाँधो,टोना के बाँधो जंजीरा । धरमदास कबीर, चकमक धुरी धर के काटे जाम के जूरी । काकर फूँके, मोर फूँके । मोर गुरु धरमदास के फूँके, जिहा से आय हस, वही चले जा, सत गुरु,सत कबीर

शनिवार, 10 अगस्त 2013

मुगल शासक अकबर और पानबाई उर्फ जोधाबाई

इतिहास तो यही कहता हे कि जयपुर के राजा भारमल की बेटी जोधाबाई का विवाह मुगल शासक अकबर के साथ हुआ था किन्तु सच कुछ और ही है। 

वस्तुत: न तो जोधाबाई का विवाह अकबर के साथ कराया गया, और न ही विदाई के समय जोधाबाई को दिल्ली ही भेजा गया।

अब प्रश्न यह उठता हे कि फिर जोधाबाई के नाम पर किस युवति से अकबर का विवाह रचाया गया था?

अकबर का विवाह जोधाबाई के नाम पर दीवान वीरमल की बेटी पानबाई के साथ रचाया गया था। दीवान वीरमल का पिता खाजूखाँ अकबर की सेना का मुखिया था। किसी बड़ी गलती के कारण अकबर ने खाजूखाँ को जेल में डाल खोड़ाबेड़ी पहना दी और फांसी का हुक्म दिया। मौका पाकर खाजूखाँ खोड़ाबेड़ी तोड़ जेल से भाग निकला, और सपरिवार जयपुर आ पगड़ी धारणकर शाह बन गया। खाजूखाँ का बेटा वीरमल बड़ा तेज और होनहार था, सो दीवान बना लिया गया। यह भेद बहुत कम लोगों को ज्ञात था।

दीवान वीरमल का विवाह दीवालबाई के साथ हुआ था। पानबाई वीरमल और दीवालबाई की पुत्री थी। पानबाई व जोधाबाई हम उम्र व दिखने में भी दोनों एक जैसी थी। 

इस प्रकरण में मेड़ता के राव दूदा राजा मानसिंह के पूरे सहयोगी और परामर्शक रहे। राव दूदा के परामर्श से जोधाबाई को जोधपुर भेज दिया गया। इसके साथ हिम्मत सिंह और उसकी पत्नी मूलीबाई को जोधाबाई के धर्म के पिता-माता बनाकर भेजा गया परन्तु भेद खुल जाने के डर से दूदा इन्हें मेड़ता ले गया और वहां से ठिकानापति बनाकर कुड़की भेज दिया। जोधाबाई का नाम जगत कुंवर कर दिया गया और राव दूदा ने उससे अपने पुत्र रतन सिंह का विवाह रचा दिया। इस प्रकार जयपुर के राजा भारमल की बेटी जोधाबाई उर्फ जुगत कुंवर का विवाह तो मेड़ता के राव दूदा के बेटे रतन सिंह के साथ हुआ था। विवाह के एक वर्ष बाद जुगत कुंवर ने एक बालिका को जन्म दिया। यही बालिका मीराबाई थी।

इधर विवाह के बाद अकबर ने कई बार जोधाबाई (पानबाई) को कहा कि वह मानसिंह को शीघ्र दिल्ली बुला लें। पहले तो पानबाई सुनी-अनसुनी करती रही पर जब अकबर बहुत परेशान करने लगा तो पानबाई ने मानसिंह के पास समाचार भेजा कि वें शीघ्र दिल्ली चले आयें नहीं तो वह सारा भेद खोल देगी। ऐसी स्थिति में मानसिंह क्या करते, उन्हें न चाहते हुये भी मजबूर होकर दिल्ली जाना पड़ा।

अकबर व पानबाई उर्फ जोधाबाई दम्पति की सन्तान सलीम हुये, जिसे इतिहास जहाँगीर के नाम से जानता है।