रविवार, 8 दिसंबर 2013

ब्रह्म ज्ञान

++++::: ब्रह्म ज्ञान :::++++

दूर निकट कुछ है नहीं, ऊँचा नीचा नाहिं ।

अन्तर बाहर एक है, 'अमृत' सबके माहिं ॥

जाग्रत स्वप्न न सुषुप्ति, तुरिया साक्षी रुप ।

'अमृत' उनमनी भाव है, अट पट भेद अनूप ॥

स्वप्न जगत् व्यवहार है, आत्म सुषुप्ति जान ।

तुरिया ब्रह्म का रुप है, 'अमृत' कर पहचान ॥

शब्द, स्पर्श अरु रुप रस, गन्ध तत्व के रुप ।

सुक्ष्म जान तन मात्रा, 'अमृत' भेद अनूप ॥

नेत्र नाक जिह्वा करण, चर्म इन्द्रि है ज्ञान ।

हस्त पाद वाणी गुदा, लिंग कर्म लो जान ॥

स्थूल सूक्ष्म कारण, महा कारण आतम गेह।

केवल ब्रह्म स्वरुप है, 'अमृत' खोजो देह ॥

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