मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

प्रक्टिकल ज्ञान

सर्वप्रथम तो वो निराकार एक मात्र परमात्मा ही था । उसमे इच्छा (रूपी प्रकृति प्रकट) हुई की मैं अनेक हो जाऊ और वो दो में विभक्त हुआ तथा उन दो से आगे के संसार के विस्तार हुआ । उस एक परमात्मा में इच्छा होते ही मन प्रकट हो गया । मन ही प्रकृति का रूप है वह परमात्मा तो निर्विकल्प था और आज भी है । वहां कोई भी संकल्प -विकल्प है ही नहीं । पूर्व में सृष्टि संकल्प मयि थी अर्थात संकल्प से ही सन्तानोपत्ति हो जाया करती थी बहुत बाद में सृष्टि मैथुन मयि हुई अर्थात सन्तानोपत्ति मैथुन से होने लगी । 

यह सब आप प्रक्टिकल ज्ञान के द्वारा जान सकते है 

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