सोमवार, 15 दिसंबर 2014

धनागम विधि

धनागम विधि 
धन की कामना किसे नहीं है?सामान्य गृहस्थ से लेकर चीवरधारी सन्यासी तक धन की प्यास से तृषित हैं।बहुत लोग धन के ऋणात्मक बोझ से ग्रसित भी हैं।ऐसे लोगों के कल्याण हेतु एक शतानुभूत साधना-प्रयोग प्रस्तुत कर रहा हूँ। मलमास,खरमास वर्जित किसी शुद्धमास के शुक्लपक्ष के किसी भद्रादि रहित मंगलवार के द्वितीयप्रहर से इस अनुष्ठान को प्रारम्भ कर सकते हैं। प्रारम्भ में साक्षी दीप प्रज्ज्वलित करके,जल,अक्षत, सुपारी,द्रव्यादि युक्त संकल्प करके सात बार इस स्तोत्र का पाठ करें,और पुनः नित्य इस क्रिया को करते रहें- कम से कम एक बर्ष तक नियमित पाठ करने से स्तोत्र सिद्ध होकर चमत्कारी फल दिखाता है।इसका दोहरा प्रभाव है- ऋण से मुक्ति मिलती है, और धन के आगमन का नया स्रोत्र खुलता है।इस पाठ के साथ-साथ सिद्ध किया हुआ ऋणमोचक-धनदा मंगलयन्त्र की नित्य पूजा भी की जाय तो अद्भुत लाभ होता है। मंगलयन्त्र की साधना विधि मैं अपने विगत लेख में प्रस्तुत कर चुका हूँ।जो व्यक्ति स्वयं यन्त्र साधना न कर सकें, वे चाहें तो मेरे यहाँ से समुचित शुल्क अदा कर मंगवा सकते हैं।सिद्धयन्त्र का दक्षिणा 5100रु.और डाक खर्च करीब 100रु.अग्रिम भेजने पर रिजस्टर्डपोस्ट से भेजा जा सकता है।
॥ऋणमोचक-धनदायक मंगल स्तोत्र॥
मंगलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रद:।
स्थिरासनो महाकाय: सर्वकामविरोधक: ॥१॥
लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकर:।
धरात्मज: कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दन: ॥२॥
अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारक:।
वृष्टे: कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रद: ॥३॥
एतानि कुजनामानि नित्यं य: श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात् ॥४॥
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम् ॥५॥
स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभि:।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पापि भवति क्वचित् ॥६॥
अङ्गारक महाभाग भगवन् भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय: ॥७॥
ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये चापमृत्यव:।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥८॥
अतिवक्रदुरारार्ध्य भोगमुक्तजितात्मन:।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥९॥
विरञ्चि शक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।
तेन त्वं सर्वसत्वेन ग्रहराजो महाबल: ॥१०॥
पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गत:।
ऋणदारिद्रयदु:खेन शत्रुणां च भयात्तत: ॥११॥
एभिर्द्वादशभि: श्लोकैर्य: स्तौति च धरासुतम्।
महतीं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा ॥१२॥
॥इति श्रीस्कन्दपुराणे भार्गवप्रोक्तं ऋणमोचन मंगल स्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥

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