सोमवार, 15 दिसंबर 2014

बहुउपयोगी यन्त्र-साधन::: भौमयन्त्र

बहुउपयोगी यन्त्र-साधन::: भौमयन्त्र


मुख्य उपयोगः- १.समस्त वन्ध्यादोष निवारण हेतु, २.पुत्र प्राप्ति हेतु,(ध्यातव्य है कि वन्ध्यादोष और पुत्रप्राप्ति में भेद है) ३.लड़का या लड़की के विवाह हेतु,४.कर्जमुक्ति हेतु,५.दरिद्रता निवारण हेतु,६.असाध्यरोगों के निवारण हेतु,७.वास्तुभूमिप्राप्ति हेतु,८.युद्ध में विजय पाने हेतु,९.स्त्रीसौभाग्य की रक्षा के लिए,१०.कुण्डली के मांगलिक दोष निवारण के लिए, ११.किसी उचित मनोकामना की पूर्ति हेतु।


ऊपर के यन्त्र में आप देख रहे हैं कि एक बड़े से त्रिकोण के भीतर इक्कीश छोटे- छोटे त्रिकोण एक विशिष्ट क्रम से सजाये गये हैं।इनमें तेरह उर्ध्व,और आठ अधःत्रिकोण हैं।इन सभी त्रिकोणों में नीचे दिये गये पञ्चाक्षर नाममन्त्रों को क्रम से प्रणवाग्रयुक्त सजादेना है;तभी यह यन्त्र पूर्ण होगा। चित्र बनाने की सुविधा के कारण मैंने इसे ऐसा ही रख दिया है।कोरलड्रॉ या पेन्ट के निपुण व्यक्ति इसे और भी सुन्दर रुप दे सकते हैं।मुझसे तो इतना ही बन पाया। आगे इसमें प्रयुक्त सभी नाममन्त्रों की सूची दिये देता हूँ।फिर इसका उपयोग और साधना-विधि पर प्रकाश डालूँगा।यहाँ मैं एक और बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि  विभिन्न लौकिक(सांसारिक)कार्यों की सफलता के लिये यह यन्त्र हजारों बार अनुभूत है।शायद ही कभी असफल हुआ हो;हुआ भी है तो प्रयोगकर्ता के आलस्य, बेवकूफी और लापरवाही से।आइये, पहले यन्त्र में प्रयुक्त होने वाले उन मन्त्रों की सूची देखें:-

१.ॐ मंगलाय नमः २.ॐ भूमिपुत्राय नमः ३.ॐ ऋणहर्त्रे नमः ४.ॐ धनप्रदाय नमः ५.ॐ स्थिरासनाय नमः ६.ॐ महाकामाय नमः 
७.ॐ सर्वकामविरोधकाय नमः, ८.ॐ लोहिताय नमः ९.ॐ लोहिताङ्गाय नमः १०.ॐ सामगानांकृपाकराय नमः ११.ॐ धरात्मजाय नमः १२.ॐ कुजाय नमः १३.ॐ भौमाय नमः १४.ॐ भूमिदाय नमः १५.ॐ भूमिनन्दनाय नमः १६. ॐ अंगारकाय नमः १७. ॐ यमाय नमः १८.ॐ सर्वरोगप्रहारकाय नमः 
१९. ॐ वृष्टिकर्त्रे नमः २०.ॐ सृष्टिहर्त्रे नमः २१.ॐ सर्वकामफलप्रदाय नमः – 

ये कुल इक्कीस नाममन्त्र हैं- पृथ्वीपुत्र मंगल के।कुछ नाम तो काफी प्रचलित और लोकश्रुत हैं,किन्तु कुछ नाम थोड़े शंकित करने वाले भी हैं।इन सभी नामों की गहराई में उतरने पर तो एक भारी भरकम ग्रन्थ तैयार हो जायेगा,जो यहाँ मेरा उद्देश्य नहीं है,और न आम आवश्यकता ही।यहाँ सिर्फ लोक कल्याणार्थ कुछ खास उपयोग पर ही प्रकाश डाल रहा हूँ।इसकी विधिवत साधना करके अनेक लाभ आप यथाशीघ्र प्राप्त कर सकते है।ऊपर वर्णित प्रयोगों के अतिरिक्त इसके और भी बहुत से रहस्यमय उपयोग हैं,जिन पर फिर कभी चर्चा होगी।जीवन में एक बार सुविधानुसार इस यन्त्र को सिद्ध करलें,फिर आवश्यकतानुसार किसी लोक कल्याणकारी कार्य में इसका उपयोग कर सकते हैं।साधना सिद्ध हो जाने के बाद, प्रयोग करने के लिए पुनः एक यन्त्र का निर्माण करना होगा- भोजपत्र या पीले सूती या रेशमी कपड़ें पर,या बाजार से तांबें के पत्तरों पर बने-बनाये यन्त्र को भी खरीद कर प्रयोग कर सकते हैं।प्रयोग के समय पहले की तरह विशेष साधना नहीं करनी पड़ती,मात्र कुछ घंटों की क्रिया से किसी को देने लायक यन्त्र तैयार होजाता है। आवश्यकता नहीं रहने पर भी वर्ष में एक बार दीपावली वगैरह शुभ अवसरों में एक छोटी साधना कर लेनी चाहिए ताकि यन्त्र साधने की शक्ति बनी रहे।

 इस यन्त्र की कुछ खास शर्तें :-
1.यन्त्र की अवमानना और दुरुपयोग न हो।

2.किसी को अनावश्यक परेशान करने के लिए यन्त्र का प्रयोग न किया जाय।

3.एक समय में, एक व्यक्ति, एक ही यन्त्र का, एक ही उद्देश्य से साधना-पूजा करें। जैसे मान लिया- पुत्रप्राप्ति के लिए यन्त्र-साधना कर रहे हैं।इस बीच घोर संकट से घिर गये,और आतुरता में उसी यन्त्र से दूसरी कामना कर बैठे।ऐसी स्थिति में यन्त्र निष्फल हो जायेगा,यानी दोनों में कोई कामना की पूर्ति नहीं होगी।

4.एक व्यक्ति एक यन्त्र की साधना एक उद्देश्य से कर रहा है,और समय पर उसकी मनोकामना पूरी हो गयी,जैसे पुत्रप्राप्ति के लिए साधना की गयी,तो पुत्रप्राप्त हो जाने के बाद यन्त्र बेकार नहीं हो गया,बल्कि विधिवत उद्यापन करके,पुनः दूसरी कामना का संकल्प लेकर उसी यन्त्र को साधते रह सकते हैं।जैसे- पहले पुत्र-कामना से साधे, अब धन-कामना से साध सकते हैं।यानी एक समय में एक कामना। इस प्रकार एक ही यन्त्र का अलग-अलग समय में अलग-अलग प्रयोग करके जीवन भर लाभ पाया जा सकता है।

5.यन्त्र शुद्ध सात्विक है,अतः मांसाहारी व्यक्ति भी जब तक इसकी आराधना कर रहें हों उन्हें मांसाहार विलकुल त्यागना होगा,अन्यथा यन्त्र की मर्यादा भंग होगी और यन्त्र निष्फल होगा।

6.तामसी आहार-विहार वाले व्यक्ति इस यन्त्र की साधना स्वयं कदापि न करें।उन्हें कोई लाभ नहीं होगा,हानि भले हो जाय।

7.सिद्ध किये हुए यन्त्र का प्रयोग कोई भी कर सकते हैं,इसके शर्तों और नियमों का ध्यान रखते हुए।

8.जन्म-मरण के अशौच को छोड़ कर,तथा स्त्रियों के रजोदर्शन के पांच दिनों की वर्जना को छोड़कर,शेष समय में कभी भी यन्त्र की पूजा बाधित नहीं होनी चाहिए।

9.अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि यन्त्र तीन महीने से एक वर्ष के अन्दर अपना प्रभाव अवश्य दिखा देता है,वशर्ते की उपासना में कोई त्रुटि न हो।

10.विशेषज्ञ द्वारा सिद्ध किये हुए यन्त्र का प्रयोग पुरुष-स्त्री कोई भी कर सकता है। इसमें लिंग वा जाति भेद नहीं है।प्रयोग करने की शर्तों का पालन करें-वस इतना ही ध्यान रखें।
11.यन्त्र साधना के साथ-साथ कुण्डली की स्थिति के अनुसार भी ग्रहशान्ति अवश्य करा लेनी चाहिए,क्यों कि कुण्डली के बाधक ग्रह यन्त्रसाधना में भी बाधक होंगे।

प्रथम साधना-सामग्रीः-
1.भौमयन्त्र लेखन हेतु पीतल या तांबे का परात,अनार के डंठल से बनायी गयी लेखनी,अष्टगन्ध(मलयगिरीचन्दन,रक्तचन्दन,केसर,कपूर,वंशलोचन,अगर,तगर,कस्तूरी का बीज)(चुंकि असली कस्तूरी आजकल एकदम दुर्लभ है,इसकारण लताकस्तूरी के बीजों का प्रयोग करना चाहिए),लालरंग में रंगा हुआ नया ऊनी आसन,लाल वस्त्र (धोती, गमछा,चादर),गंगाजल,रोली,सिन्दूर,अबीर,सुपारी,मौली,लाल फूल,पीला फूल, (ओड़हुल, गेंदा),धूना,गुगल,देवदारधूप,(अगरबत्ती नहीं),प्रसाद हेतु पेड़ा,छुहारा,गूड़,लौंग, छोटी इलाइची,अक्षत के लिए अरवाचावल(लालरंग या कुमकुम में रंगा हुआ),हल्दीचूर्ण, पंचामृत(दूध,दही,घी,गूड़,मधु),आम का पल्लव,पान पत्ता,रुद्राक्ष या रक्तचन्दन की माला, अखण्डदीप(घी का),रक्षादीप(तिलतेल का),माचिस,मिट्टी का दीया,मिट्टी का ढकना, आचमनी,लोटा,तस्तरी,कटोरी आदि पूजन पात्र।

नोटः-भौमयन्त्र की साधना क्रम में कुल मिलाकर १०८बार उक्त यन्त्र को लिखना है, और इक्कीश नाममन्त्रों में प्रत्येक का दश-दश हजार यानी २१×१०,०००=दोलाख दश हजार कुल मन्त्र जप करना है।साथ ही १०८बार पंचोपचार पूजन भी करना है।प्रत्येक बार(१०८बार)पूजन के बाद यन्त्रगायत्री का एक माला(१०८बार)जप भी करना है।साधना प्रारम्भ करने से पूर्व आदेश प्राप्ति हेतु गायत्री मन्त्र का १०,०००जप,तथा विघ्नविनाशक गणपति का १००० मन्त्र जप भी अनिवार्य है।आदेश प्राप्ति का कार्य सुविधानुसार कुछ पहले भी कर सकते हैं- इस संकल्प के साथ कि मैं अमुक कार्य हेतु भगवती गायत्री से आदेश चाहता हूँ।हाँ,वैसे व्यक्ति जो नित्य संध्या-अभ्यासी हैं, और गायत्री के सहस्रजापी हैं,उन्हें कुछ अतिरिक्त करने की आवश्यकता नहीं है।वे सीधे भौम यन्त्र की साधना प्रारम्भ कर सकते हैं।मूल साधना की कुल क्रिया को आप अपनी सुविधानुसार इक्कीश या इक्कतीस दिनों में विभाजित कर सकते हैं।

कार्य-प्रणाली की स्पष्टीः-१.यन्त्र को अष्टगन्ध से १०८बार लिखना-इसमें प्रतिबार करीब पन्द्रह मिनट समय लगेगा,२.प्रत्येक बार(१०८बार)यन्त्र का पंचोपचार पूजन करना,और मिटाना,तथा पुनः लिखना,३.इक्कीस त्रिकोणों में दिये गये सभी मन्त्रों का जप करना-कुल जप दोलाख,दशहजार करना है।प्रत्येक हजार में कम से कम बीस मिनट समय लगेगा।यानी २०मि.×२१०हजार=४२००मि.=७०घंटे,+ १०८बारलेखन,पूजन में ५४ घंटे, यानी कुलमिलाकर १२४घंटे,या इससे भी अधिक लग सकते हें।चार घंटे नित्य का कार्यक्रम रखें तो इक्कतीस दिनों का अनुष्ठान होगा।इस बीच पूर्णरुपेण अनुष्ठानिक नियम-संयम विधि का पालन करना अनिवार्य है।

मुहूर्त विचारः-अनुष्ठान प्रारम्भ करने के लिए मुहूर्त विचार के क्रम में ध्यातव्य है कि मंगल अपने उच्च यानि मकरराशि पर हों,अथवा अपने दोनों घरों में(मेष या वृश्चिक) कहीं हों- उन कालों में जो भी मंगलवार हो,रिक्ता, भद्रादि दोष रहित हो,गुरु-शुक्रादि अस्त,बाल,वृद्धादि दोष रहित हों- इन सभी योगों के संयोग में अनुष्ठान प्रारम्भ करना चाहिए।मंगल सम्बन्धी कार्य अपराह्न में वर्जित है,यानी दोपहर बारह वजे तक क्रिया समाप्त कर लेनी चाहिए।पुनः अगले दिन भी इसी प्रकार करें।

साधना की व्यावहारिक बातेः-
नित्य-कर्म-पूजा-प्रकाश(गीताप्रेस) आदि विभिन्न पुस्तकों में संकल्प सहित,प्राण-प्रतिष्ठा-मन्त्र और विनियोग दिया रहता है। किसी भी पूजा की संक्षिप्त विधि भी दी हुयी रहती है।इसके लिए उक्त पुस्तक का सहयोग लेना श्रेयस्कर होगा।अनुष्ठान सम्पन्न होजाने के बाद संक्षिप्त रुप से एक हजार हवन भी कर लेना चाहिए।हो सके तो पांच ब्राह्मण और सात भिखारियों को भोजन भी करा दें।इससे अनुष्ठान में काफी बल मिलता है।ध्यातव्य है कि प्रत्येक बार यन्त्र लेखन,पूजन के पश्चात् विसर्जन और प्रक्षालन भी करना है।प्रक्षालित किये गये जल(धोवन)को जहाँ तहां न फेंके।खैर का वृक्ष कहीं पास में हो तो उसकी जड़ मे डाल देना सर्वोत्तम है।न उपलब्ध हो तो किसी पौधे में या नदी तालाब में डाल सकते हैं,किन्तु तुलसी के पौधे में न डालें।

प्रयोग कब-कैसे -मूलतः प्रयोग विधि सबके लिए समान है,किन्तु कार्य भेद से थोड़ा अन्तर है।
1) सन्तान की कामना से यदि उपासना करनी हो तो पति-पत्नी दोनों को एकत्र पूजा करनी होगी,तभी सही लाभ मिलेगा।किसी एक के करने से लाभ मिलने वाले समय में अन्तर आयेगा।यानी फल में कमी आयेगी।हाँ,मासिक धर्म के पांच वर्जित दिनों में पुरुष अकेले ही यन्त्र की पूजा करेगा,इसे नियम में ऋटि नहीं मानी जायेगी।
2) परिवार में सुख-शान्ति-समृद्धि के लिए उचित है कि परिवार का हर सदस्य पूजा करे,क्यों कि उसका लाभ सामूहिक है,अतः साधना भी सामूहिक होनी चाहिए।हाँ, परिवार के सभी लोग एक साथ बैठ कर ही साधना करें यह आवश्यक नहीं,किन्तु जहाँ तक हो सके प्रयास करें कि पूजा एक साथ ही हो। सामूहिक पूजा और व्यक्तिगत पूजा में गहरा भेद है।पारिवारिक यन्त्र-साधना का प्रसाद-वितरण भी परिवारिक स्तर पर होना चाहिए।किसी बाहरी व्यक्ति(कुटुम्ब,मित्र आदि)को भी नहीं देना है,अन्यथा आपके लाभ में वह भी हिस्सेदार बन जायेगा।
3)विवाह या मांगलिक दोष निवारण के उद्देश्य से यन्त्र साधना करनी हो तो जिसे जरुरत है वही(लड़का/लड़की)पूजा करे,किसी और को नहीं करनी है।यहाँ तक कि उसका प्रसाद भी कोई और को नहीं देना है।
4)वास्तुभूमिप्राप्ति के लिए भी उचित है कि पति-पत्नी मिल कर पूजा करें।सामूहिक परिवार हो तो सामूहिक पूजा करें,ताकि लाभ शीघ्र मिल सके।
5)विशेषज्ञ द्वारा सिद्ध किया हुआ यन्त्र मंगवाकर,किसी शुभ मुहूर्त में मंगलवार से इसका अनुष्ठान प्रारम्भ किया जा सकता है।नित्य की यन्त्र पूजा में मात्र पन्द्रह मिनट समय लगता है।साथ ही एकमाला(१०८बार)मन्त्र जप करने में दश मिनट,यानी कुल पचीस मिनट की नित्य क्रिया है।
6)यन्त्र-पूजा में सामान्य पूजन सामग्री की ही आवश्यकता है।इस पर आगे प्रकाश डाला जा रहा है।

मंगलयन्त्र की नित्य पूजाविधिः-नवीन लाल वस्त्र पहन कर लाल रंग के उनी आसन पर पूर्वाभिमुख पति-पत्नी बैठ कर पूजन करें।पूजा के समय पति के दाहिने भाग में ही पत्नी को बैठना चाहिए।सिद्ध यन्त्र को तांबे की थाल में लाल वस्त्र बिछा कर रख दें,या सिंहासन,चौकी,पीढ़ा आदि पर लाल कपड़े का आसन देकर यन्त्र को खड़ा भी रखा जा सकता है।यन्त्र को पोंछने के लिए और पूजा के बाद ढकने के लिए भी अलग-अलग, एक-एक लाल वस्त्र रखना जरुरी है।इन तीनों वस्त्रों को महीने में एक बार बदल देना चाहिए।नित्य संकल्प कर सकें तो बड़ी अच्छी बात है,अन्यथा मानसिक संकल्प से भी काम चल सकता है।वस श्रद्धा,भक्ति,और दृढ़ विश्वास चाहिए।

अन्य आवश्यक सामग्रीः-कुमकुम,लाल रंगा हुआ अरवाचावल,रोली,अबीर, सिन्दूर,मौली धागा,लालचन्दन का चूर्ण,सफेद चन्दन का चूर्ण,हल्दी चूर्ण,लाल फूल,पीला फूल,दीपक। प्रसाद हेतु गूड़ अनिवार्य है,साथ ही छुहारा,किसमिस, बादाम,आदि कुछ भी यथाशक्ति रख सकते हैं। देवदार धूप(अगरबत्ती नहीं)क्यों कि अगरबत्ती बांस की तिल्लियों पर बनी होती है,जिससे सन्तान की हानि होती है।आजकल हरिदर्शन,गायत्रीदर्शन,आदि बहुत तरह के धूपबत्ती बाजार में उपलब्ध हैं।किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है।)मुख शुद्धि के लिए नित्य पान पत्ता जरुरी नहीं है,चढ़ाते हैं तो अच्छा है।न हो तो भी कोई बात नहीं।किन्तु लौंग-इलाइची अवश्य चढ़ायें।पूजा के बाद कपूर की आरती दिखाना चाहिए।नित्य श्रद्धानुसार कुछ दक्षिणा भी चढ़ाना चाहिए।महीने भर के एकत्र पैसे को किसी भिखारी या ब्राह्मण को दिया जा सकता है।हो सके तो सप्ताह में एक दिन-मंगलवार को विशेष प्रसाद के रुप में गूड़-घी में बनाया हुआ हलवा या खजूर अवश्य चढ़ा दें।पूजा की समाप्ति पर विनीत भाव से प्रार्थना करें- 
हे यन्त्रदेवता!आप मुझ पर प्रसन्न होकर यथाशीघ्र मेरी मनोकामना पूरी करें/मुझे सन्तान दें/मुझे योग्य पति/ पत्नी प्रदान करें/मुझे शत्रुपर विजय दिलावें/आवासीय भूमि की व्यवस्था करें....आदि।

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