शनिवार, 22 नवंबर 2014

॥ ब्रह्म - उपासना ॥

!! श्री गुरुभ्यो नमः !!
विश्वं मायामयत्वेन रूपितं यत्प्रबोधतः ।
विश्वं च यत्स्वरूपं तं वार्तिकाचार्यमाश्रये ॥
•*´¨`*•.¸¸.•*´¨`*•.¸¸•*´¨`*•
॥ ब्रह्म - उपासना ॥
•*´¨`*•.¸¸.•*´¨`*•.¸¸•*´¨`*•
नारायण ! विचार करें : एक सच्ची घटना है : ईसा के उपदेश में लिखा है कि कभी कोई तेरे एक गाल पर थप्पड़ मारे तो तू दूसरा गाल आगे कर देना । एक जगह रेल में एक आदमी चढ़ा , वह बड़ा हृष्टपुष्ट था । उसने एक आदमी से जगह बनाने के लिये कहा कि ज़रा सरक जा । जिससे कहा था वह दुबला - पतला आदमी था । उसने कहा नहीं सरकता। इसने देखा कि और कहीं जगह नहीं थी और वह लम्बी टांग करके बैठा था । इसलिये इसने थोड़ा सा धक्का दिया , उसका पैर मुड़ा और यह वहाँ बैठ गया । उस दुबले - पतले आदमी ने उस तगड़े आदमी को एक थप्पड़ मार दी । उसने गाल सहलाया और साथ में याद आया कि " मैं ईसाई हूँ , " उसने दूसरा गाल सामने कर दिया और कहा कि इस पर भी मार दे । वह दुबला आदमी गुस्से में तो था ही , उसने झट दूसरे गाल पर भी थप्पड़ मार दिया । अब पहलवान उठा , सोचा बाईबल में लिखा है कि कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल सामने करो ; दूसरे पर मारे तो क्या करो यह तो वहाँ लिखा नहीं है । उसने उस दुबले को उठाया और रेल के बाहर फेंक दिया ! कहा कि बाईबल की उतनी बात तो मान ली जितनी लिखी है । जितनी युक्तियाँ आपको याद रटाये जायेंगे , उतनी ही आप समझ पायेंगे । परिस्थिति बदल गई तो फिर अन्दर की वे ही वासनायें आपमें प्रकट होंगी । ईसा का भाव यह था कि किसी भी परिस्थिति में , किसी भी प्राणी को दुःख मत दो । जैसे शास्त्रों के अन्दर कहा " मा हिंस्यात् सर्वाणि भूतानि " किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो , यह इसका तात्पर्य हुआ । लेकिन जो व्यक्ति उस तात्पर्य को नहीं समझेगा , हृदय में नहीं उतारेगा , वह वही करेगा जो रेल वाले ने किया । इसी प्रकार जिस व्यक्ति ने इस तत्त्व - मीमांसा को स्वतः कर लिया , उसकी कृतार्थता हो गई । बाकी जितने साधन हैं , वे मनुष्य को कृतार्थ नहीं करते , अर्थात् उनमें कुछ - न - कुछ पाना शेष रह जाता है ।
नारायण ! महात्माओं में एक कथा प्रसिद्ध है कि " कौतुकपुर " नाम का एक नगर था । वहाँ " बहुस्वर्ण " नाम का राजा था । वह बहुतों को तरह - तरह के धन दान किया करता था । लेकिन उसका ही एक क्षत्रिय नौकर था जिसका नाम " यशोवर्मा " था । उसे वह कभी कुछ नहीं देता था । बाकी सबको देता था । यशोवर्मा जब कहे कि " मेरे को भी कुछ दे दो " तो राजा उस यशोवर्मा से कहे " क्या बताऊँ , मैं तो देना चाहता हूँ लेकिन { सूर्य की तरफ अंगुली दिखाकर कहे } यह नहीं देने देता । " वह बेचारा यशोवर्मा चुप रह जावे । एक बार सूर्यग्रहण का समय आया । यशोवर्मा ने कहा कि " आज तो सूर्य को ग्रहण लगा हुआ है , इसलिये छिपा हुआ है , अब ना नहीं कर सकते , आज तो मेरे को कुछ दे दो । " राजा बहुस्वर्ण ने विचार किया कि अब तो दे दूँ , नहीं तो बुराई होगी । उसने उसे कुछ धन और कपड़े आदि दे दिये । वह ले गया । लेकिन वह तो थोड़े दिनों में खत्म हो गये । अब वह बेचारा रोज देखे कि कब सूर्यग्रहण आये और कब मुझे कुछ मिले । रोज़ - रोज़ तो ग्रहण आता नहीं , ग्रहण का कोई ठिकाना नहीं है । पहले तो यशोवर्मा के पास धन नहीं था , इसलिये धन का अभाव उतना नहीं खटकता था । धन पास में न हो तब तक दुःख कम होता है । होकर छिन जाये तब दुःख ज़्यादा होता है । इस दुःख को देने का तरीका आजकल के लोगों ने बड़ा सुन्दर निकाला है । आपने दो सौ रुपये वाले की तन्ख्वाह ढाई सौ रुपये कर दी । पहले महीने में उसको पचास रुपये ज़्यादा खर्च करने को मिल गये , अब उसे ज़्यादा चीजें खरीदने की आदत हो गई , दूसरे महीने में आपने इतनी महँगाई बढ़ा दि कि जो पचास रुपये तनख्वाह बढ़ी थी , वह भी खत्म और तीसरे महीने बाकी 250 दो सौ पचास भी खत्म हो गये ! इससे अच्छा तो महँगाई न बढ़ाते और उस बेचारे के दो सौ रखे रहते तो वह सुखी रहता । लेकिन जैसे किसी काल में राज्य की , सेठों की यह इच्छा रहती थी कि जो हमारी प्रजा हैं , जो हमारे नौकर हैं , वे सुखी रहें , वैसे ही आज राज्य से मालिकों तक सबकी यह इच्छा रहती है कि जो हमारे अन्तर्गत हैं , वे सुखी न हो पायें । एक - एक युग की एक - एक इच्छा होती है , क्या करेंगे ! उनको सुखी देखकर प्रसन्न नहीं होते हैं । एक जगह कहीं हम गये हुए थे तो उसका नौकर तंग पायजामा पहने हुआ था । हम उसे नहीं समझते , लेकिन वह मालकिन हमसे कहने लगी , " देखिये स्वामी जी ! क्या जमाना आया है ! यह नौकर ऐसा पायजामा पहनता है । " हमने कहा , बात तो ठीक है लेकिन सवेरे , तेरा लड़का भी ऐसा ही पायजामा पहने था । कहने लगी " वह और बात है । " यदि बुरी है तो दोनों के लिये बुरी मानो , लेकिन मन में भाव यह है कि अच्छा है , इसलिये मेरा लड़का तो पहने, नौकर क्यों पहने ? हृदय में उन्हें देखकर प्रसन्नता नहीं है । इस प्रकार राजा और प्रजा का व्यवहार है ।
नारायण ! जब पहली बार यशोवर्मा को धन मिल गया तो उस बेचारे की आदत बिगड़ गई। अब सूर्यग्रहण का क्या ठिकाना , कब आये ? कभी सास में तो कभी दो - तीन साल में एक बार आये , कभी न आये । उसकी बीबी घर में रोज झगड़ा करे कि जब एक बार लाये तो ग्रहण क्यों नहीं करते । वह बेचारा कहे कि " यह मेरे हाथ में नहीं है । " उसने कहा " करना पड़ेगा । तेरे को मेरे से प्रेम नहीं है , होता तो ग्रहण लगा लेता । " उसने कहा " यह तो राहु लगाता है । " बड़ा दुःखी होकर उसने सोचा कि यह जीवन रखने में अब कोई फायदा नहीं है । वहाँ से चलकर " विन्ध्याचल " { मिर्ज़ापुर के पास } गया । वहाँ देवी का एक मन्दिर है । वहाँ उसने कहा " हे भगवती ! अब इस शरीर को रखने से कोई फायदा नहीं है । मालिक देना नहीं चाहता और बीबी उसके बिना घर में रखना नहीं चाहती । इसलिये जीवन का कोई फायदा नहीं । या तो तू मेरे को सुखी कर या आमरणांत अनशन { प्रायोववेशन रहकर } रखकर शरीर छोड़ दूँगा । यह तब तक करूँगा जब तक मरूँगा नहीं या जब तक इच्छा पूरी नहीं होगी । " आजकल की भूख हड़ताल नहीं समझ लेंगे कि कड़ाह प्रसाद खाते हुए भूख हड़ताल चलती रहती है ! सच्चा प्रायोपवेशन था । वह वहीं बैठ गया । कुछ दिन बाद भगवती ने सोचा कि यह कलंक का टीका लगायेगा । भगवती प्रसन्न हो गई , पूछा " क्या चाहिये ? " यशोवर्मा ने कहा " सुख चाहिये । " भगवती ने कहा " गज़ब हो गया , तू सुख चाहता है और संसार में सुख नाम की चीज़ कहाँ से आये ? सुख कई तरह के होते हैं धन का सुख , भोग का सुख , धर्म का और ज्ञान का सुख होता है। इसलिये तू यह बता कि तेरे को कौन - सा सुख चाहिये ? " उसने कहा " माते ! मैंने आज तक इन चारों में से कोई सुख नहीं देखा । न मेरे को अर्थ मिला , न मेरी कभी काम - भोग की इच्छा पूर्ण हुई , न मैंने कभी त्याग या धर्म किया और मोक्ष का तो नाम आज सुना है। इसलिये तू ही बता दे या जो चाहे सो दे दे । " भगवती ने कहा " ऐसा नहीं होगा । मैं तेरे को ठिकाना बता देती हूँ , तू खुद जाकर कुछ पता लगा ले । फिर तेरे को जो चीज़ अच्छी लगे , सो मांग लेना । "
नारायण ! श्री भगवती ने यशोवर्मा को चार जनों का ठिकाना बता दिया कि " अर्थवर्मा " , " भोग - गुप्त " , " त्याग - शर्मा " और " ज्ञान - गिरि " अमुक - अमुक देश में अमुक - अमुक स्थान पर रहते हैं । उनके पास जाकर तू अध्ययन करके आना और फिर जो ठीक लगे सो मांग लेना । यशोवर्मा ने भगवती की बात मान लिया । सबसे पहले यशोवर्मा अर्थवर्मा के पास चलकर गया । 
नारायण ! श्री माता भगवती के बात को मानकर यशोवर्मा अध्ययन करने के लिए सबसे पहले " अर्थवर्मा " के पास पहुँचा , वहाँ देखा कि सेठ की बहुत बड़ी कोठी है । तब तक बैंक का जमाना नहीं आया था , इसलिये सोने की गिन्नियों को थैली में भरकर देते थे और गिनते नहीं थे , तोलते थे । उसने देखा कि गिन्नियों का मनों में आदान - प्रदान हो रहा है। वह तो यह देखकर हैरान हो गया कि मैंने तो जन्म भर एक धेला नहीं देखा और यहाँ बोरे ही बोरे भरे हैं ! उसने सेठ से कहा कि " मैं विन्ध्याचल से आया हूँ और कुछ दिन तुम्हारे साथ रहना चाहता हूँ । " सेठ ने कहा " ठीक है , मैं भी भगवती का भक्त हूँ , तुम बैठो , साथ ही चलेंगे । " काम - काज के बाद घर पहुँचे । जब भोजन करने बैठे तो उसको तो बढ़िया घी भरे सात पतरत वाले पराँठे और दाल भी जिसके ऊपर खूब घी तैर रहा था मिले , लेकिन खुद सेठ ने एक छोटा - सा सूखा फुलका और मूंग की दाल का पानी लिया और उबली हुई तोरई ली । उसने सेठ से पूछा " आपका आज कोई व्रत है क्या ? " उसने कहा " नहीं , " " जब व्रत नहीं है तो फिर मेरे को घी के सात परत वाले पराँठे और अपने को यह ? " सेठ ने कहा " क्या बताऊँ , मेरे को हजम नहीं होता । यह तो तू आज आया है, इसलिये तेरा साथ देने के लिये मैंने दो छोटे फुलके रख लिये हैं , नहीं तो मैं एक " सूप " नाम की चीज़ पीता हूँ । " दाल को ऐसा छान दो कि उसमें भी दाल का दाना न आये , वह " सूप " होता है । यशोवर्मा ने कहा गजब हो गया , फिर यह इतना सोने का आदान - प्रदान करता किस लिये है ? दूसरे दिन फिर दिन भर उसके साथ रहा , सेठ बेचारा खूब काम करता रहे और यह देखे कि बड़ा परिश्रम करता है । सोचा कि आज तो इसे खूब भूख लगी होगी , आज रात्रि को डटकर खायेगा । जब रात्रि को घर पहुँचे तो बढ़िया सुन्दर खीर बनी थी जिसमें सेर भर दूध को पाव भर बनाकर उसमें थोड़ा चावल , बादाम , पिस्ते , मेवे सब डाले जाते हैं ; खूब बढ़िया पुलाव बनाया था जिसमें मटर , पनीर सब डाला हुआ था ; खुम्बी का बढ़िया सुन्दर साग बनाया हुआ था । लेकिन उस रात भी बेचारे सेठ ने वही दाल का पानी लिया ! उसने पूछा " यह क्या बात , आज तो दिन भर मेहनत भी करते रहे , आज तो बढ़िया माल लो क्योंकि दिनभर परिश्रम किया है और परिश्रम से हजम हो जाता है । " सेठ ने कहा " आज कुछ लेना तो नहीं था , लेकिन मेरे को आधा पाव दूध दे दो और थोड़े से उबले चावल , { पुलाव नहीं } दे दो । इससे ज्यादा हिम्मत नहीं है । " दोनों में प्रेम हो गया और दोनों एक ही कमरे में सोये । रात को यशोवर्मा को स्वप्न आया कि चार बड़े - बड़े आदमी दण्ड लेकर आये हैं और अर्थवर्मा को पीट रहे हैं कि " आज तूने अपनी हस्ती से ज्यादा क्यों खाया ? तूने सवेरे दो फुलके खा लिये और रात में आधा पाव दूध और उबले चावल खा लिये । " उसने कहा " यह मिल गया , इसके कारण खाना पड़ा , मुझे छोड़ दो । " उन्होंने कहा " कैसे छोड़ दें , तेरे को रखवाली के लिये रखा है या इस तरह खाने के लिये ? " वह उठा तो देखता है कि अर्थवर्मा कराह रहा है , भात और दूध से वायु का गोला उठ रहा है । उस दिन बेचारो को वमन अर्थात् उल्टी हुई और सूप भी निकल गया । यशोवर्मा समझ गया कि स्वप्न में मुझे देवी ने दिखाया कि यहाँ डण्डे पड़ते हैं । सवेरे उसने कहा " मुझे आगे जाना है । " अर्थवर्मा ने कहा " दो - चार दिन और रहो । " उसने कहा " मुझे जो देखना था , सो देख लिया । " वहाँ से कान पकड़ कर निकला कि मुझे कभी भी धन नहीं लेना है , धन से यह हालत होती है ।
नारायण ! दूसरे ठिकाने पर भोगगुप्त के पास चला । दो - चार दिन के बाद उस शहर में पहुँचा जहाँ भोगगुप्त रहता था । एक बढ़िया मकान के बाहर की तरफ के एक कमरे में भोगगुप्त ठहरा हुआ था । यशोवर्मा ने जाकर पहले बाहर के लोगों से पूछा कि यहाँ भोगगुप्त का मकान कौन सा है ? किसी को पता नहीं था । अन्त में 11 ग्यारह नम्बर में पहुँचा , सोचा गलत तो नहीं हो सकता है क्योंकि देवी ने गलत ठिकाना नहीं दिया होगा। वहाँ के दरबान ने कहा " यह भोगगुप्त का मकान नहीं है , भोगगुप्त को तो हमारे मालिक ने ठहरा रखा है , है तो वह किसी काम का नहीं लेकिन फिर भी उसे ठहरा रखा है । " यशोवर्मा ने दरबान से कहा " मैं उनसे मिलने आया हूँ । " दरबान ने जाने दिया । अन्दर गया , देखा कि एक बढ़िया सुन्दर कमरे में भोगगुप्त बैठा हुआ है । कहा " मैं विन्ध्याचल से आया हूँ । " उसने हाथ जोड़कर कहा कि " मैं भी भगवती विन्ध्येश्वरी का भक्त हूँ , मेरे बड़े भाग्य कि आप आये । " पूछा " यह आपका मकान नहीं है ? " कहा " मैं इतने पैसे कहाँ से इकट्ठे करूँ जो बनाऊँ ? यह मकान मेरे दोस्त का है । " उसने सोचा " ठीक है , यहाँ धन नहीं है , भोग है । " कहा " एक - दो दिन साथ रहेंगे । " दिन में उसके साथ चला । वह एक दुकान से दूसरी दुकान में पहुँचा , सब जगह लोग उसे प्रेम से बिठाते । उसका दलाली का काम था , ज्यादा धन पास में नहीं था । लेकिन भोग तो करना ही था । दलाल का काम ही यह है कि इसका माल उसको और उसका माल इसको दिया । बेचारे ने कभी एक की खुशामद और कभी दूसरे की जी - हजूरी की , जिसका नतीजा यह हुआ कि शाम तक उसने पाँच सो रुपये बना लिये और शाम को यशोवर्मा से कहा कि अब " ओब्राय इण्टरकाण्टिनेण्टल " चलो या जो उस जमाने के साधन रहते होंगे । वे वहाँ गये तो पाँच सौ के पाँच खा - पीकर खत्म कर दिये । कहा " सबेरे की बात छोड़ो क्योंकि कौन जाने कल की खबर नहीं या जग में पल की खबर नहीं । " खा - पीकर घर पहुँचे तो दरबान ने पहला प्रश्न किया कि " आपने कल 25 रुपये उधार लिये थे , वह अभी तक नहीं दिये ? " भोगगुप्त का थोड़ा - सा मुँह सिकुड़ा कहा " कल ले लेना । " दरबान ने कहा " शरम नहीं आती । " कहा " दे दूँगा । " उसी समय हाथ की घड़ी उतार कर उसे दे दी । कहा " कहीं होटल में इसके साथ खाने के लिये चला गया था । " दोस्त ने कहा " आओ , अपने थोड़ी देर बातें करें । " यह वहाँ से पीकर आया था , ऊटपटांग बोलने लगा । दोस्त ने कहा " मैँने तेरे को सारी सुविधायें दी हैं , तुम शाम को मेरे से दो घण्टे बातें भी नहीं करते । " यशोवर्मा ने विचार किया " बड़ी फजीहत है , भोग तो सारे मिले हुए हैं , दूकान में हाँ जी , हाँ जी करता था , दरबान से भी दबकर रहता है । " रात में बेचारा सोया , शराब पी रखी थी तो उल्टियाँ होने लगीं " भोगे रोगभयम् । " यशोवर्मा ने निर्णय किया कि यहाँ इस जीवन में भी कोई तत्त्व नहीं है । दूसरे दिन सवेरे उठा , कहा " मैं तो जा रहा हूँ । " भोगगुप्त ने कहा " थोड़े दिन रहो । " कहा " भर पाये , अब जाने दो । "
नारायण ! वहाँ से चलकर कान पकड़े कि ऐसी चिंता में ग्रस्त होकर भोग करने से कोई फायदा नहीं है । भोग के बिना अर्थ बेकार और निश्चिन्तता के बिना भोग बेकार है । आपके सामने बढ़िया से बढ़िया भोजन सामग्री रख दिया जाये और चिन्ता का एक बीज डाल दिया जाय तो खाने का आनन्द नहीं । कमाने के लिये उसने पाँच सौ कमा लिये लेकिन किसी ने कहा कि कल से मेरी दुकान पर नहीं आना , क्योंकि दलाल ठहरा । यशोवर्मा भोगगुप्त के यहाँ से चलते - चलते त्याग शर्मा के पास पहुँचा । दो - चार दिन लग गये । रास्ता जो लम्बा था । त्याग शर्मा का कमरा बड़ा सुन्दर गोबर से लीपा - पोता हुआ शुद्ध था । ऊपर बड़ा सुन्दर पुआल पड़ा हुआ था जो सर्दी में गरम और गर्मी में ठण्डा रहे । घास - फुस का घर ऐसा ही होता है । चोरी का भी डर नहीं । वह प्राप्तः उठकर वेद - स्वाध्याय , वेद मन्त्रों का उद्घोष करे , फिर यज्ञ करे । वहाँ पहुँचकर यशोवर्मा को बड़ी प्रसन्नता हुई कि इसको निश्चिन्तता है , अर्थ भी नहीं है और भोग भी नहीं है । इसके पास धर्म है , त्याग है । इसको किसी प्रकार की चिन्ता नहीं है । तब तक राजा का एक आदमी ने आकर कहा कि " राजा साहब आपको याद कर रहे हैं । " त्याग शर्मा ने कहा " मैंने एक महीने का नियम ले रखा है , इसमें मुझे कहीं नहीं जाना है और अमुक हवन पूर्ण करना है । " मन्त्री ने कहा " राजा ने कहा है कि सोने के थाल में मोती भर कर दूँगा । " उसने कहा " राजा से कह देना कि एक नहीं , एक सौ आठ थाल भी भर कर दें तो भी मैं अपना नियम नहीं छोड़ने वाला हूँ । " यशोवर्मा को लगा कि यह बड़ा त्यागी है । इसके मन में कोई चिन्ता नहीं है । पाँच - सात दिन उसके साथ रहा तो यशोवर्मा का चित्त बड़ा प्रसन्न रहा । कभी संगीत का , कभी काव्य का तो कभी पुराण ग्रन्थों का आनन्द ले रहा है , जो लोग आते उनके साथ तत्त्व विवेक चल रहा है । पाँच - चार दिन के बाद एक दिन ओले पड़ गये , ठण्ड हो गई और त्याग शर्मा को बुखार आ गया । बुखार में शरीर काँपे , फिर भी सवेरे उठा । यशोवर्मा ने कहा " लेटे रहो , तुम्हारा शरीर काँप रहा है , तबियत खराब है । " उसका शरीर काँप रहा है और मुँह से " हा - हा , राम - राम " निकल रहा है लेकिन उसको तो ठण्डे पानी से नहाना हुआ! नहा - धोकर बिना कपड़े पहने ही बैठ गया । यशोवर्मा ने कहा " बण्डी तो पहन लो। " उसने कहा " यज्ञ सिले कपड़े पहनकर नहीं होता । " उसे बुखार था ही , और कमज़ोर होता गया । यशोवर्मा ने सोचा कि यहाँ भी कठिन परिस्थिति है , घबराने लगा । सोचा इसके अन्दर भी सुख तो है , अर्थी को बिलकुल सुख नहीं , उसकी अपेक्षा भोगी को भोग - काल में सुख है लेकिन आगे - पीछे सुख नहीं । त्यागी धर्मात्मा को उससे भी ज्यादा सुख है लेकिन वह भी तो धर्म के बन्धन में है । सब देखकर यशोवर्मा ने विचार किया कि इसमें भी सुख नहीं है । वहाँ से आगे चला । उसने कहा थोड़े दिन और रहो लेकिन यशोवर्मा ने कहा कि " देख लिया जो देखना था । "
नारायण ! आगे पहुँचा तो ज्ञानगिरि जी के यहाँ पहुँचा । एक जंगल में एकान्त कुटिया के अन्दर बड़े आनन्द से बैठे हुए महात्मा तत्त्व - विचार कर रहे थे । वहाँ पहुँचा , तो उन्होंने कहा कि " आज यहाँ भिक्षा की व्यवस्था नहीं है , कहीं और जा । " उसने कहा " मैं आपसे मिलने आया हूँ । " " किसने कहा है ? " कहा " विन्ध्येश्वरी से आया हूँ । " महात्मन् ने कहा " मेरी भी वही इष्ट है , तू आया , तो बड़ा अच्छा किया । " उन्होंने उसको बिठाया और कहा कि " मैं आधे - एक घंटे में आता हूँ । " गाँव से जाकर दूध , मलाई ले आये और कहा - " खाओ । " यशोवर्मा ने कहा " आप तो कहते थे कि यहाँ भिक्षा की व्यवस्था नहीं है । " उन्होंने कहा " मैंने नियम बना रखा है कि मैं किसी के घर माँगने नहीं जाता । सन्यासी की कई वृत्तियाँ शास्त्रों में बताई हैं । एक कुत्ते की और एक अजगर की वृत्ति होती है । जैसे कुत्ते को जहाँ भोजन की सुगन्धि आई , वहाँ पहुँच गया। कुछ न कुछ देंगे , या रोटी या मुक्का ! दूसरी , अजगर वृत्ति कि कोई आ गया तो देगा , नहीं तो बैठा है । मेरी अजगर वृत्ति है । मैंने ऐसा नियम बना रखा है , फिर भी आज तू विन्ध्येश्वरी भगवती का भक्त आया है , इसलिये माँग लाया । " यशोवर्मा ने कहा " आपको शरम नहीं आई कि लोग क्या कहेंगे । " उन्होंने कहा " लोगों को जो कहना है , कहने दो , अपने को उससे क्या ! तू आनन्द से बैठकर खा । " न तो यहाँ अर्थ वालों की चिन्ता है और न भोग की और न त्यागी का बन्धन है । यहाँ तो " सहज स्थिति " है । उसने कहा " आगे से आपको रोज माँगने जाना पड़ेगा । " महात्मा ने कहा " कल से फिर नियम बना लूँगा कि नहीं जाऊँगा , इसमें क्या है ! " जब उसने देखा तो पाया कि उसमें किसी प्रकार का कोई भी परिवर्तन नहीं है । उस दिन दूध - मलाई खाई तो भी कुछ नहीं , बड़े आनन्द से हजम हो गई । यशोवर्मा जब वहाँ दो - एक दिन रहा तो उन्होंने किसी से कह दिया कि यशोवर्मा को घर ले जाकर खिला दिया करो । वहाँ दो - एक दिन कोई भोजन नहीं आया तो उसने पूछा कि " आपको भूख नहीं लगती ? " कहा " भूख किस बात की ? कभी - कभी व्रत रख देने से शरीर ठीक हो जाता है । " फिर एक दिन अच्छा माल आ गया , रबड़ी , पूरी , दम आलू बनकर आये । उसने सोचा कि इन्होंने दो दिन से कुछ नहीं खाया है , यह खाने से पेट बिगड़ जायेगा । लेकिन उस दिन भी दोनों ने डटकर खाया। उसने विचार किया कि इनको तो किसी भी परिस्थिति में कोई फर्क पड़ता ही नहीं है । बस ईश्वर के उपासना की यही कृतार्थता है ।
नारायण ! वापिस जाकर विन्धेश्वरी भगवती से यशोवर्मा ने कहा कि " मेरे को तो ज्ञान गिरि जैसा सुख दो । लेकिन माँ ! एक बात बताओ , कि आपने मुझे दर - दर क्यों भटकवाया ? " देवी ने कहा " पहले मेरी कही हुई बात होती , इसलिये तेरे दिल में नहीं उतरती । अब तू देख आया है , इसलिये तेरे दिल में उतर गई । नहीं तो तू सोचता कि टालने के लिये बाबा जी बनने को कह रही हूँ । " जिसने इस चीज को तत्त्व से अनुभवपूर्वक , अर्थ , धर्म , काम सबको समझकर देख लिया कि इसमें कुछ नहीं है , वह कृतार्थ होकर प्रतिक्षण आनन्द लेता है । उसकी कृतार्थता , उसकी ब्रह्म - उपासना यहीं सफल हो जाती है । इति शम् ।
नारायण स्मृतिः

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें