रविवार, 21 जून 2015

जोग अर्थात योग

                                          प्रस्तुत है ।  जोग

                                श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी से ये वाणी ।

                          सुहि महला 1 घरु 7 । 1 ओन्कार सतगुर प्रसादी ।

जोग न खिंथा जोग न डंडे जोग न भस्म चढ़ाइए । जोग न मुंदी मूंड मुंडाइऐ जोग न सिंगी वाइए ।
अंजन माहि निरंजन रहिए जोग जुगत इव पाइए । गलीं जोग न होई ।
एक दृष्टी कर समसरि जाणे जोगी कहिये सोई । जोग न बाहर मणि मसानि जोग न ताड़ी लाइये ।
जोग न देस दिसंतरी भविये जोग न तीरथ नाइये । अंजन माहि निरंजन रहिए जोग जुगत इव पाइए ।
सतगुरु भेटे ता सहसा तूटे धावतु वरज़ि रहाइये । निझरू झरेई सहज धुनी लागे घर ही परचा पाइये ।
अंजन माहि निरंजन रहिए जोग जुगत इव पाइए । नानक जीवतिआ मरि रहिये ऐसा जोग कमाइये ।
वाजे बाझहु सिंगी वाजे तौ निरभौऊ पद पाइये । अंजन माहि निरंजन रहिए जोग जुगत इव पाइए ।
नानक जीवतिया मरि रहिये ऐसा जोगु कमाइये ।।

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